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फैसले का दिन

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16 Dec की उस घटना जिसने पूरे भारत का स्वर एक कर दिया आज उसके फैसले का दिन आ गया लेकिन कितना मायने रखता है ये फैसला। ज़ाहिर है उस परिवार के लिए तो मलहम है लेकिन समाज के लिए इसका कुछ मतलब है।
कितनी भी तत्परता दिखाई हो लेकिन इस तरह के जुर्म में कोई खास कमी आती नहीं दिखाई दी और ये बहुत अफ़सोस की बात है की एक केस ख़त्म नहीं हुआ तो कई और मुह बाए खड़े है। कोई इतना घ्रणित अपराध कर देता है और हमें महीनो लग जाते है ये जानने में की वो नाबालिग तो नहीं है। कई केस तो समाज की नज़र में भी नहीं आये होंगे तो सजा तो दूर की चिड़िया है। क्या ये मज़ाक नहीं है उसके साथ जिसने ये अपराध सहन किया है।लेकिन क्या करे हम सब कानून के हाथो बंधे हुए है जो की एक हद तक सही है कानून की नज़र में सब बराबर हैं। फिर वो जो कानून बनाने का काम करते है उनपर कानून का शिकंजा देर से क्यों कसता है और किस भावना से वो देश के कानून बनवाने में अपनी भागीदारी दे सकते है।
समाज का परिवर्तन जरुरी है लेकिन समाज के अपने प्रति कर्तव्यों को भूलने जैसा परिवर्तन किसी सभ्य समाज के लिए जरुरी नहीं हो सकता।

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